| 000 | 05043nam a2200217Ia 4500 | ||
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| 003 | OSt | ||
| 005 | 20260512161625.0 | ||
| 008 | 210210b1987 xxu||||| |||| 00| 0 eng d | ||
| 040 | _cAL | ||
| 041 | _aSanskrit | ||
| 082 | _aS491.5 SHAV | ||
| 100 |
_aSHASTRI (Charudev). _dचारुदेव शास्त्री _9263831 |
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| 245 |
_aVyakaranchandroday. Vol 1. (Karak va samas). _bव्याकरणचंद्रोदय: प्रथम खण्ड (कारक व समास ) |
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| 260 |
_aDilli. _bMotilal Banarsidass., _c1987 |
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| 300 | _a192 | ||
| 440 |
_a1 _9263832 |
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| 520 | _aव्याकरणचन्द्रोदय के पाँच खण्ड प्रकाशित हो चुके है। प्रथमखण्ड कारक-निरूपणात्मक है। द्वितीय कृतिद्धित-विषयक है। तृतीय खण्ड तिङ् व्याख्यानपरक है। चतुर्थ स्त्रीप्रत्यय, सुबन्त, अव्यय-परक है। पञ्चम खण्ड शिखा, संजा, परिभाषा, संहिता, लिङ्ग-विषयक है। लक्ष्यलक्षणे व्याकरणम्-यह सर्वसम्मत व्याकरण का स्वरूप माना जाता है। तो भी पूर्व विद्यमान व्याकृतिग्रन्थों में लक्ष्य का अत्यल्प उपादान है। पुरानी शैली से लिखे गये वृत्ति आदि ग्रन्थों में एक-दो लक्ष्यों में लक्षण (सूत्र) की प्रवृत्ति को दिखाने से वृत्तिकारादि अपने को कृतार्थ मानते हैं। नूतन रीति से लिखे गये व्याकरणग्रंथों में प्रयोगों के उदाहरण देने का प्रयत्न तो है, पर वे उदाहरण या तो स्वयं-घटित होते हैं, या भट्टिकाव्यादि में उठाये जाते हैं, जहाँ व्याकरण सिखाने के लिए वे घड़े गये हैं और जिनमें अनेकानेक ऐसे हैं जो साहित्य में कहीं भी प्रयुक्त नहीं हुए, अतः अव्यवहार्य हैं। इस वर्ग के विद्वान भूल जाते हैं कि व्याकर अन्वाख्यान-स्मृति हैं-व्याक्रियन्ते पदानीह क्रियन्ते नूतनानि न। इस कृति का वाग्व्यवहार सिखाना प्रधान लक्ष्य है। प्रक्रिया इस साध्य में साधनमात्र है। व्यवहार उपकार्य है, प्रक्रिया उपकारक। अतः इस कृति में जहाँ सूत्रादि की विशद व्याख्या की गई है, सूत्रादि की प्रवृत्ति द्वारा सरल, शङ्कासमाधान-सहित, क्रमबद्ध रूपसिद्धि दी गई है, वहाँ वैदिक-लौकिक उभयविध वाङ्मय से शतशः वाक्य उद्धृत किये गए हैं जो व्याकरण-व्युत्पादित उस-उस लक्ष्य को प्रयोगावतीर्ण दिखाते हुए उसकी साधुता को यथेष्ट रूप से प्रमाणित करते है और व्यवहार सिखाने में अत्यन्तोपकारक हैं। स्थान-स्थान पर अपेक्षित नूतनार्थोपन्यास, पूर्वमतसमीक्षा, संक्षिप्त वैयाकरणो-क्तिविशदीकरण, यथासंभव अष्टाध्यायीगत-सूत्रक्रमाश्रयण आदि असामान्य धर्म असामान्य धर्म इस कृति को अन्य कृतियों से पृथक् करते हैं और मौलिकता की ओर संकेत करते है। | ||
| 690 |
_aSanskrit Grammar _9263833 |
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| 906 | _a049068 | ||
| 942 |
_2ddc _cBK |
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| 999 |
_c97991 _d97991 |
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