TY - BOOK AU - KUMAR (Mukesh) TI - TRP TV news aur bazar: टी आर पी टीवी न्यूज़ और बाज़ार SN - 9789350728680 U1 - H891.8 KUMT PY - 2015/// CY - New Delhi PB - Vani Prakashan KW - मुकेश कुमार द्वारा लिखित पुस्तक "TRP, TV News Aur Bazar" इस बात पर प्रकाश डालती है कि कैसे समाचार बाजार की ताकतों के अधीन हो गया है। KW - Journalism KW - highlights how news has become subject to market forces N2 - टेलीविजन चैनलों के सम्बन्ध में होने वाली तमाम चर्चाओं में टीआरपी का जिक्र लाजिमी तौर पर आ जाता है। मीडिया से जुड़े लोग या प्रबुद्ध जन ही नहीं, आम दर्शक भी अब बखूबी जानते हैं कि टीवी चैनल टीआरपी की होड़ में आगे निकलने के लिए तरह-तरह के तमाशे और प्रपंच रचते रहते हैं। चैनल अगर किसी ख़बर को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते हैं, उसे तोड़ते-मरोड़ते हैं या मसाला-मिर्च लगाकर चटखारेदार बनाते हैं तो इसके पीछे उनकी टीआरपी की अन्तहीन लिप्सा ही होती है। लेकिन ये भी सचाई है कि लोग टीआरपी के बारे में बस इतना ही जानते हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं। उन्हें पता नहीं होता कि वास्तव में यह टीआरपी है क्या, ये कहाँ से आयी, क्यों आयी और किस तरह से चैनलों को अपने इशारों पर नचा रही है? वे ये तो जानते हैं कि टीआरपी टेलीविजन न्यूज“एवं कार्यक्रमों को प्रभावित कर रही है, मगर इसकी प्रक्रिया से वे अनजान हैं? टेलीविजन को बेहतर ढंग से समझने के लिहाज से ये सवाल बहुत अहमियत रखते हैं, क्योंकि इनका सम्बन्ध केवल टेलीविजन के बदलते चाल, चरित्र और चेहरे से ही नहीं है, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था से भी है। टीवी, बाजार और टीआरपी ये तीनों ही आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं और इनके अन्त सम्बन्ध एक दूसरे को बड़े पैमाने पर प्रभावित भी कर रहे हैं। ऐसे समय में जब हम एक टीवी-समाज में तब्दील कर दिए गए हैं और बाजार टीवी के जरिए हमें उपभोक्ता समाज के रूप में ढालकर सब कुछ अपने स्वार्थ साधने में लगा हो तो ये प्रश्न सीधे मानवीय अस्तित्व से भी जुड़ जाते हैं। मिसाल के लिए अगर इस गँठजोड़ की वजह से पत्रकारिता अपने उद्देश्य से भटक जाती है और चौथे खम्भे के रूप में मीडिया अपनी भूमिका का निर्वाह सही ढंग से नहीं कर पाता तो पूरा लोकतन्त्र ही ख़तरे में पड़ जाता है। हम ये होता हुआ देख भी रहे हैं, ख़ास तौर पर वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य इसकी पक्की गवाही देता है। टेलीविज“न पर बाजार के नियन्त्रण ने उसे लोक तथा लोकतन्त्र दोनों से काट दिया है। यही वजह है कि वह जन समस्याओं को भूल चुका है और जन सरोकारों से उसका सम्बन्ध टूट चुका है। उत्तेजनाओं और भावोन्मादों से खेलना उसका एकमात्र एजेंडा बन गया है। वह परिवर्तन का, गरीबी, विषमता, शोषण, अशिक्षा आदि से लड़ने का औजार नहीं रह गया है। उसे गाँव-देहात, मजदूर-किसान की सुध नहीं रह गयी है। सस्ते मनोरंजक फार्मूलों में बँधकर वह अवाम के लिए अफीम बनकर रह गया है। ER -